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Asst. Professor (HoD)

Blog image DR. RAJESH KUMAR SINGH Shared publicly - May 1 2021 2:26PM

ROMAN CIVILIZATION MA SEMESTER 2 ANCIENT CIVILIZATION


प्रश्न। रोमन सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन का वर्णन करें। M.A. Semester 2. विश्व की प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास। Rajesh kumar singh, asst. Professor, history. dspmu. भौगोलिक स्थितिः- यूनान के पश्चिम में इटली का देश है। यह यूरोपीय महादेश के दक्षिण में भूमध्य • सागर में स्थिति एक प्रायद्वीप है। इसके उत्तर में आल्पा के पहाड़ हैं, जो यूरोप के अन्य भागों से इटली को अलग करते हैं। इटली के बीचोबीच उत्तर से दक्षिण तक एपेनाइन पर्वतमाला है। सारा देश एक पहाड़ी क्षेत्र है। केवल समुद्रतटीय प्रदेश समतल मैदान है। इसके अतिरिक्त दो, अरनी और टाइवर नदियों के मैदान भी है। इटली का मैदानी क्षेत्र समतल तथा उपजाऊ पायी जाती है। इस क्षेत्र में वर्षा भी पर्याप्त होती हैं। इटली में भूमध्यसागरीय जलवायु पायी जाती है। अतः यहाँ न तो अधिक सर्दी पड़ती है और न अधिक गर्मी। यह जलवायु स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी उपयुक्त है। रोम की स्थापना:- प्राचीनकाल में इटली में एक उच्च कोटि की सभ्यता का जन्म तथा विकास हुआ। इस सभ्यता को हम रोम की सभ्यता के नाम से जानते हैं। कारण, रोम इस सभ्यता का मुख्य केन्द्र पा यह केवल इटली की राजधानी ही नहीं, बल्कि इसकी आत्मा भी था। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार टाइबर नदी के तट पर रोम के नगर की स्थापना रोमलस तथा टामस नामक दो भाइयों के द्वारा की गयी थी, किन्तु एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार ट्रोजन युद्ध के विजेता इनीज के पुत्र इनीज सिलवियरा ने रोम की नींव डाली थी। सच्चाई क्या है, कहना कठिन है। अनुमानतः रोम नगर की स्थापना लगभग 753 ई० पू० में की गयी। भौगोलिक दृष्टि से यह नगर काफी सुरक्षित था। धीरे-धीरे उन्नति करता हुआ यह नगर . इटली की सभ्यता का मुख्य केन्द्र बन गया। कालान्तर में रोम एक विशाल साम्राज्य बन गया। रोम की सभ्यता के निर्माता:- जब यूनान में नगर राज्यों का विकास हो रहा था, उस समय बहुत से कबीले के लोग इटली के मैदानी क्षेत्रों में आकर बस गये। इटली के सर्वप्रथम निवासी उत्तरी अफ्रिका, स्पेन और फ्रांस से आकर बसे थे। दो सौ ई० पू० के कुछ बाद इण्डो-यूरोपीय भाषा-भाषी जाति के लोग आस पर्वतों को पार कर इटली में आकर बसने लगे। कालान्तर में बहुत से यूनानी भी इटली के दक्षिणी हिस्से में आ बसे। एट्रस्कन नामक जाति के लोग भी इटली में आकर रहने लगे थे। ये लोग काफी शक्तिशाली थे। पश्चिमी इटली में इनका व्यापक प्रभुत्व हो गया। इटली के निवासी उल्लिखित जातियों के ही वंशधर थे। रोम की सभ्यता के जनक ये ही लोग थे। रोम की सभ्यता का उत्कर्ष लगभग छठी शताब्दी ई० पू० में हुआ। यूनानी सभ्यता के पश्चात् रोम की सभ्यता उन्नति के शिखर पर पहुँच गयी। रोमन सभ्यता का महत्त्व:- रोम की सभ्यता यूनानी सभ्यता की भाँति प्राचीन अथवा अन्य सभ्यताओं की भाँति मौलिक नहीं हैं। फिर भी, यूरोपीय सभ्यता को इसने गहरे रूप से प्रभावित किया। जिस रूप में हम वर्तमान पश्चिमी सभ्यता को देखते हैं, उसकी उत्पति तो यूनान में हुई थी, किन्तु तत्वतः वह रोमन ही अधिक है। इस संदर्भ में अर्नेस्ट बारकर ने लिखा है, "यदि यूनानी गौरव अन्तिम काल में एकता का आदर्श बना तो इस आदर्श का वास्तविक स्वरुप रोम ने प्रदान किया।" रोमन सभ्यता का प्रसार इंगलैंड से सुदूर अफ्रिका और स्पेन से बेविलोन तक हुआ। इतिहासकार हनशा ने रोमन सभ्यता को सभ्यताओं के बीच की कड़ी कहा है। रोमन सभ्यता ने विश्व की आधुनिक सभ्यता के विकास में प्रशंनीय योगदान किया है। यूनान बहुमूल्य देनों को रोमन ने ही संजोकर रखा और ईसाई धर्म का प्रचार किया। रोम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्राचीन रोम के इतिहास को सामान्यतः तीन भागों में बांटा जाता है (1) राजतंत्र काल (509 ई० पू० तक) (2) गणतंत्र काल (503 से 27 ई० पू० तक) (3) साम्राज्य काल (27 ई० से लेकर 470 ई० तक) सामाजिक व्यवस्था सामाजिक वर्गीकरण: प्रजातंत्र काल में रोम का समाज मौलिक रूप से दो वर्गों में बेटा हुआ पान तथा प्लीबियन पहले वर्ग के लोग अभिजात वर्ग के थे और दूसरे वर्ग में सामान्य नागरिक जाते थे। पैट्रीशियन: मैट्रीशियन वर्ग के लोग धनाढ्य, बड़े-बड़े जमीनों के स्वामी अथवा बड़े व्यापारी लोग थे। वे सारी सुविधाओं से युक्त सुखी सम्पन्न लोग थे। वे सुन्दर मकानों में रहते बच्चे वस्त्र पहनते तथा सुस्वादिष्ट भोजन करते थे। इनका अधिकांश समय, खेल-तमाशों और अन्य प्रकार के आमोद-प्रमोदों में व्यतीत होता था। राज्य की सारी सत्ता उनके हाथों में थी। सिनेट में इनका बोलबाला था और इस वर्ग के लोग ही कॉन्सल, डिक्टेटर, सेनापति, आदि उच्च पदों पर बड़ाल किये जाते थे प्लीबियन: दूसरे वर्ग में जनसाधारण आते थे, जिन्हें प्लीबियन कहा जाता था। इसमें छोटे किसान, मजदूर तथा कारीगर लोग शामिल थे जो अथक परिश्रम कर अपना जीवन निर्वाह करते थे। इन्हें किसी तरह सुविधा अथवा अधिकार प्राप्त न था। राजसत्ता से उनका दूर का वास्ता भी नहीं था। ये बढी वेबसी से अपना जीवन यापन करते थे, इनके खाने-पीने पहनने अथवा रहने के साधन पर्याप्त नहीं थे। करों की बोझ से ये दबे रहते थे । पैट्रीशियन वर्ग के लोग प्लीबियन वर्ग के लोगों का शोषण करते थे । वर्ग संघर्ष का प्रारम्भ:- इस प्रकार दोनों वर्गों के बीच आसमान जमीन का अन्तर था। स्थिति अ थी। संघर्ष अनिवार्य हो गया। लगभग इस दोनों वर्गों के बीच दो शताब्दियों तक संघर्ष चलता रहा। अन्त में, इनके बीच समझौता हो गया। प्लीबियनों को भी कुछ अधिकार दिये गये। अब सभी पदों पर उनकी नियुक्ति होने लगी। उनकी अपनी एक लोक सभा कायम हुई, जिसे 'कॉमिसिया ट्रिब्यूटा' कहा जाता था। अभिजात वर्ग: रोमन साम्राज्य की स्थापना तथा विस्तार के साथ रोमनों के सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आये। इस युग में रोम का समाज चार वर्गों में बँट गया अभिजात वर्ग, धनी व्यापारियों का वर्ग, मध्यम वर्ग तथा दास वर्ग । पहले वर्ग के लोग बड़े-बड़े जमींदार होते थे। सभी उच्च सैनिक एवं प्रशासनिक पद इनके लिये सुरक्षित रहते थे । धनी व्यापारीः- दूसरा वर्ग धनी व्यापारी तथा साहूकारों का था। साम्राज्य विस्तार के साथ उद्योग-धन्धों एंव व्यापार में अप्रत्याशित प्रगति के कारण ये लोग बड़े धनवान हो गये थे । आर्थिक जीवन कृषि तथा पशु-पालनः प्रारंभ में रोम की अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि ही थी। वे कृषि एवं प पालन के द्वारा ही अपना जीविकोपार्जन करते थे। रोम के प्रधान कृषि एवं उद्यान उत्पादन गेहूं, जब मटर, जैतून, नारंगी, अंगूर, अंजीर इत्यादि अन्न फल थे। कृषि के विकास के लिए पशु पालन मी एक प्रधान व्यवसाय बन गया था। साम्राज्य विस्तार के कारण व्यापार में अप्रत्याशित उन्नति हुई। इसमें कुछ लोग काफी धनी बन गये। इन लोगों ने धन के बल पर छोटे किसानों से उनकी अधिकांश जमीनों को खरीद लिया। अब किसान बेरोजगार हो गये। बड़े जमींदारों की खेती दासों के द्वारा की जाने लगी। इस कारण बाद में रोम में कृषि की अवनति हुई। पुनः दूर के देशों से सस्ते अनाज का आयात होने लगा। बनाज उगाने की अपेक्षा बायात किया हुआ अनाज सस्ता होता था। इस कारण भी अब लोगों की अभिरुषि कृषि कार्यों में नहीं रह गयी। उद्योग धंधे: साम्राज्य विस्तार से अगर एक ओर कृषि की अवनति हुई तो दूसरी ओर व्यापार की उन्नति के चलते दस्तकारियों में तेजी से उन्नति हुई। विभिन्न प्रकार के धातुओं में संबंधित उद्योगध तथा लकड़ी और चमड़ा उद्योग का काफी हुआ। सूती और ऊनी कपड़े निर्माण बड़े पर किया जाने लगा। कांच के सामान भी बड़े पैमाने पर तैयार किये जाते थे। मिस्र, सीरिया और एशिया माइनर में सूती तथा ऊनी वस्त्र तैयार किये जाते थे। स्पेन, फारस और एशिया माइनर अपने लोहे की खानों के लिए प्रसिद्ध थे। शुरू में मिस्र तथा सीरिया कांच के सामानों के लिए प्रसिद्ध थे, किंतु बाद में साम्राज्य के पूर्वी तथा पश्चिमी क्षेत्रों में भी कांच के सामान तैयार किये जाने लगे। खानों की खुदाई भी एक महत्वपूर्ण उद्योग था। आभूषण निर्माण भी बड़े स्तर पर होता था। काठ, पत्थर तथा ईंट के कारोबार भी चमक उठे। काठ के जहाजों का निर्माण भी बड़ी संख्या में किया जाता था। वाणिज्य:- साम्राज्य की स्थापना के कारण रोम में वाणिज्य व्यवसाय की काफी तरक्की हुई। साम्राज्य में सैकड़ों की संख्या में शहरों का उदय हुआ। सम्राट हैड्रियन के समय शहरों की संख्या बीस हजार बताई जाती है। ये शहर वाणिज्य व्यापार के प्रधान केंद्र बन गये। रोम के विस्तृत साम्राज्य में यातायात एवं संचार के उद्देश्य से रोमनों ने बहुत सी पक्की सड़कों का निर्माण किया। आज उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के अनेक देशों में बहुत सी सड़कें उन्हीं सड़कों के ऊपर बनी मिलती हैं, जिनकी नींव कभी रोम के लोगों ने रखी थी। पहले इन सड़कों का उपयोग दूर दूर तक सैनिकों को भेजने के लिए किया जाता था। किंतु बाद में इन्हीं सड़कों के द्वारा संसार के दूर-दूर के देशों, यहां तक कि भारत तथा चीन साथ भी व्यापार किया जाने लगा। साम्राज्य के सभी भागों से जोड़ने वाली रोम की सड़कों की व्यवस्था इतनी अच्छी थी कि यह अंग्रेजी कहावत चल पड़ी कि सभी सड़कें रोम को जाती है। ब्रिटेन और स्पेन से लेकर बेबीलोन तक इन मार्गों पर अनेक नगर बस गये। धार्मिक जीवन रोम के देवी-देवताः- रोमवासियों के जीवन में धर्म का बड़ा महत्व था। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आरंभ में रोम के लोग एक ईश्वर में विश्वास करते थे। किंतु जब वे पूनानियों के संपर्क में आए तो उनके बीच अनेक देवी-देवताओं की पूजा चल पड़ी। वे मूर्तिपूजक भी थे। उनकी देवी-देवताओं में जुपिटर, जुनो मार्स, मिनर्वा, मर्करी, एपोलो, बालकन आदि मुख्य थे। जुपिटर वर्षा का देवता था, जिससे उनकी फसलों की रक्षा होती थी। मार्स युद्ध में उनकी सहायता करता था। मर्करी नामक देवता उनका संदेश वाहक था। जूनों उनकी स्त्रियों की रक्षा करता था। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में किसी दैवी शक्ति का अस्तित्व है, ऐसा उनका विश्वास था। साम्राज्य विस्तार के कारण रोमनों का संपर्क पूर्व के देशों के साथ हुआ। इस संपर्क का रोमनों के धार्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसी कारण रोम में मिस्र की इसीस और ओसिरीस की पूजा बत पड़ी। रोम में सम्राट पूजा तथा उनके रहस्यवादी पूजाओं का जन्म भी इसी संपर्क के कारण हुआ। मंदिर उपासना तथा पुजारी:- यूनानियों की भांति रोमनों का भी विश्वास था कि उनके देवताओं का स्वरूप मनुष्य जैसा ही होता है। देवताओं की उपासना के लिए बड़े-बड़े सुंदर मंदिर बनाए जाते थे। उनका विश्वास था कि देवताओं की पूजा करने से वे प्रसन्न होते हैं। अतः देवताओं की पूजा रोम में बड़े ही धूमधाम से की जाती थी। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वे बलि भी चढ़ाया करते थे। मानव बलि की प्रथा भी -प्रचलित थी। किंतु इस संदर्भ में एक बात याद रखने की है कि रोमनों के धर्म तथा पूजा एक सार्वजनिक कर्तव्य था, व्यक्तिगत कार्य नहीं। मंदिरों और धार्मिक त्यौहारों का प्रबंध पुरोहित वर्ग के लोग किया करते थे। पुरोहितों की समिति होती थी। मंदिरों की देखभाल तथा धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न करने के अतिरिक्त यह समिति धार्मिक जुलूस के समय मार्ग में आने वाले पुलों की मरम्मत भी कराती थी। रोमनों की धार्मिक उदारता:- रोमन सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि धर्म के मामले में रोम के लोग बड़े ही सहिष्णु तथा उदार थे। धर्म के प्रश्न को लेकर रोमनों ने पराजित देश के लोगों पर कभी अत्याचार नहीं किया। वे सदा दूसरों के धर्म और देवी-देवताओं का सम्मान किया करते थे। पूर्वी देशों के साथ संपर्क में आने पर रोम में मिस्र की 'इसिस' और 'बोसिरीस' तथा इरान के 'मित्र' की पूजा होने लगी। पूर्वी संपर्क के कारण ही रोम में साम्राट की पूजा तथा अनेक रहस्यवादी पूजाएं प्रारंभ हुई। सम्राट की पूजा का प्रचलनः- रोम में सम्राट पूजा का प्रचलन आगस्टस के समय से शुरू हुआ। आग की पूजा देवता के समान की जाने लगी और उसके बाद तो रोम के लोगों ने अपने सभी सम्राटों की पूजा देवता की तरह की। वस्तुतः वे राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे, अतः उसकी पूजा किया करते थे। खेद की बात तो यह है कि इस प्रथा को रोमनों पर भी लादा गया।



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